
बहुत दिनों के बाद कुछ अनकहे अल्फाज़ का तीसरा भाग आया है। काफी दिनों से समय नहीं मिल रहा था, ना ही कुछ अल्फाज़ बचे थे जो कि मैं उस के लिए कुछ लिख सकूं…
लेकिन जब शाम का समय या फिर रात होती थी तो उसकी यादें बिन बुलाए मेहमान की तरह अपनी दस्तक दे देती थी। और फिर मजबूरी मैं कलम और पेन उठाना पड़ता था
सच कहूँ तो जो यादें थी वो अब धुंधली सी होने लगी थी, क्योंकि उसको भुलाने की दुआ सीधे रब से मांग रखी थी। लगता है उसी दुआ का ये असर हो रहा था वो तो बहुत पहले ही दूर हो गया था पर अब उसकी यादें भी दूर हो रही थी
मुझे पता है कि वो अभी यह पढ़ कर खुश जरूर हुई होगी की मैं उसे भूल गया हूं। पर सुन
• ये मत सोचना कि मैं तुझे भूल गया हूं..
तेरे दिए हुए ज़ख्मों से उभर गया हूं…
• अगर तूने घाव शरीर पर दिए होते तो तुझे कब का भुला दिया होता..
पर तूने तो वार भी दिल पर किया है..
तो अब तू ही बता तुझको मैं कैसे भुला दू..
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• मुझे आज भी याद है हमारी वो पहली मुलाकात..
जब कॉलेज की कैन्टीन मैं हुई थी हमारी बात…
इंजीनियरिंग ड्रॉइंग का वो उस समय काम कर रही थी… जब मैं उसके सामने बैठा तो वो शर्मा बहुत रही थी..
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• उसकी वो आँखों की चमक, चेहरे की वो मासूमियत, होंठो की वो मुस्कराहट आज भी मुझे याद है… ऐसा लगता है मानो जैसे अभी पिछले ही कल की ये बात है
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• वो हमेशा कहती थी कि जितनी मासूम दिखती हूँ उतनी मैं हूँ नहीं…
पर मैं उसकी इन बातों को मज़ाक समझता रहा.. बना कर उसको खुदा बेइंतहा प्यार करता रहा..
पर अब सोचता हूं काश उसकी इन बातों को पहले समझ लिया होता… तो ना आज मैं रोता और ना ही ये कुछ अनकहे अल्फाज़ लिख रहा होता…
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• कहती थी कि सौरव तुम सिर्फ मेरे हो… पर उसने ये कभी नहीं बताया कि वो किसकी है…
काश उस से ये सवाल मैंने भी पूछ लिया होता… तो आज मैं भी चैन की नींद सोता..
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• सोचता हूं कि तुम्हारी इस बेवफाई का बदला कुछ इस कदर लूँगा… करके तुझे भरी महफिल मैं बदनाम कहीं का ना छोड़ूंगा… पर क्या करूँ मेरा दिल मेरे को यह इजाजत नहीं देता है, पता है क्यू….. क्यूंकि आज भी यह दिल कहीं ना कहीं तेरे लिए धड़कता है..
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• जब भी कभी किसी मन्दिर मैं जाता हूँ… तो खुद से पहले खुदा से तुम्हारी खुशी की दुआ मांगता हूं….
हे खुदा खुश रखना उसे.. कभी दिल लगा था मेरा जिस से…
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• दिन के उजाले में ना सही पर रात के अंधेरे मैं तुम्हारे बारे में जरूर सोचता हूं…
पहले दुआ मांगता था तुझे पाने की… पर अब तुझे भुलाने की दुआ मांगता हू…
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• ये मत सोचना कि तेरे हिस्से का वक़्त किसी और के साथ बीतता है… बस अब ये शायर कभी इश्क तो कभी नफरत लिखता है…
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• एक दिन उसके नए वाले आशिक से पूछूंगा जरूर.. अखिर ऐसी कैसी मोहब्बत का इज़हार कर गए तुम…
ना वो हमारी रही ना ही खुद के रहे हम..
To be continued…
” ये कहानी यहीं खत्म नहीं होगी ”

धन्यवाद